Skip to content

Shri Shiv Chalisa

Chalisa · 1 verse · 3 min read

॥ श्री शिव चालीसा ॥

The Above Recitation is by Ravindra Sathe.

Verse 1

दोहा जै गणेश गिरिजासुवन । मङ्गलमूल सुजान ॥ कहातायोध्यादासतुम । दे उ अभयवरदान ॥ चौपायि जै गिरिजापति दीनदयाल । सदाकरत सन्तन प्रतिपाल ॥१॥ भाल चन्द्र मासोहतनीके । काननकुण्डल नागफनीके ॥२॥ अङ्गगौर शिर गङ्ग बहाये । मुण्डमाल तन छारलगाये ॥३॥ वस्त्र खाल बाघम्बर सो है । छबि कोदेखि नागमुनिमोहै ॥४॥ मैना मातुकिहवै दुलारी । वाम अङ्ग सो हत छ बि न्यारी ॥५॥ कर त्रिशूल सोहत छ बि भारी । करत सदा शत्रु न क्षयकारि ॥६॥ नन्दिगणेश सोहैत ह कै से । सागरमध्य कमलहै जै से ॥७॥ कार्तीक श्याम और गणरावु । या छबिकौ कहि जात न कावु ॥८॥ देवन जबहि जाय पुकारा । तबहिदुखप्रभु आपनिनारा ॥९॥ किया उपद्रव तारकभारी । देवन सबमिलि तुम् हि जुहारी ॥१०॥ तुरत षडानन आप पठायवु । लवनिमेष मह मारि गिरायवु ॥११॥ आपजलन्धर असुर संहारा । सु यश तुं हार विदित संसारा ॥१२॥ त्रिपुरासुर सन युद्धम चा ई । स बहि कृपा कर लीन बचा ई ॥१३॥ किया तपहि भगीरथभारी । पुरव प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥१४॥ दानिन मह तुम समतोवुनही । नेवकस्तुति करत सदाहि ॥१५॥ वेदनाम महिमा तवगा ई । अकध अनादि भेदन हि पा ई ॥१६॥ प्रगटी उदथि मथन मे ज्वाला । जरतसुरासुर भये निहाला ॥१७॥ कीन्हदया तह करी सहा ई । नीलकण्ठ तवनाम क हा ई ॥१८॥ पूजन रामचन्द्र जबकिन्ह । जीतके लङ्क विभीषण दीन्ह ॥१९॥ सहस कमलमे होरहेधारी । कीन्ह परीक्षा त बहि पुरारी ॥२०॥ एककमल प्रभुराखेवु जो ई । कमलनयन पूजन चह सो ई ॥२१॥ कठिनभक्ति देखी प्रभु शङ्कर । भये प्रसन्नदियो इच्छितिवर ॥२२॥ जय जय जय अनन्त अविनासी । करतकृपा सबके घटवासी ॥२३॥ दुष्टसकल नितमोहि सतावै । भ्रमत रहेमेहिचैन न आनै ॥२४॥ त्राहि त्राहिमै नाधपुकारो । याहि अवसरमोहि आन उबारो ॥२५॥ वैत्रिशूल शत्रुन कोमारो । सङ्कट नेमोहि आनि उबारो ॥२६॥ मातपिता भ्राता सबको ई । सङ्कटमे पूछत नहिको ई ॥२७॥ स्वामि एकहै आशतुम्हारी । आय हरहु अबसङ्कट भारी ॥२८॥ धन निरधनको देत सदाहि । जो को ई बाम्बेवोफल पाही ॥२९॥ स्तुतिकेहिविधि करौ तुम्हारी । क्षमहनाथ अबचूक हमारी ॥३०॥ शङ्करहो सङ्कटके नाशन । विघ्न विनाशन मङ्गल कारन ॥३१॥ योगी यति मुनिध्यान लगा । वैशारद नारद शीशनवावै ॥३२॥ नमो नमो जै नमः शिवाय । सुरब्रह्मादिक पार न पाये ॥३३॥ जो यह पाठ क रै मनला ई । तापर होतहै शम्भु सहा ई ॥३४॥ ऋनिया जो को ई होअधिकारी । पाठक रै सो पावन हारी ॥३५॥ पुत्रहोनकर इच्छाकोई । निश्चय शिव प्रशाद ते हि होई ॥३६॥ पण्डित त्रयोदशी कोलावै । ध्यानपूर्व क रा वै ॥३७॥ त्रयोदशी व्रत करैहमेशा । तन नहि ताकेरहै कलेशा ॥३८॥ धूपदीप नैवेद्य चढावै । शङ्कर सन्मुख पाठसुनावै ॥३९॥ जन्म जन्मके पापवसावै । अन्तवास शिवपुरमे पालै ॥४०॥ दोहा नित नेम करिप्रातहि पाठकलौ चालीस तुममेरी मनकामना पूर्ण हु जगदेश ॥ मगकर छठि हेमन्त ऋतु संवत् चौंसठ जान स्तुति चालीसा शिव जि पूर्ण केन कल्यान ॥ नमः पार्वती पतयेनमः

About this stotra

The Shri Shiv Chalisa (v2) is a devotional hymn in praise of Lord Shiva, consisting of 40 verses (Chalisa meaning forty). This version is composed in the Avadhi language and represents a popular variant of the Shiva Chalisa, with slight differences in wording and structure compared to the Geeta Press version. It recounts Lord Shiva’s divine attributes, his marriage to Parvati, his destruction of the Tripura demons, his boon to Ramachandra at Rameshwaram, and his grace upon devotees. Reciting this Chalisa with devotion is believed to bring the devotee closer to Lord Shiva and bestow peace and prosperity.

Related Chalisas